दिल्ली में लोकतंत्र बनाम लोकलुभावनवाद: चुनाव 2025 की सियासी पटकथा

सांकेतिक चित्र : चैट जीपीटी 

सुरिन्द्र कुमार: दिल्ली यूं तो "दिल्ली वालों" के दिलों में बसती है, लेकिन इसकी असली चाहत क्या है—यह न कोई समझता है और न ही समझना चाहता है। स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी से जनता वंचित है, परंतु मुफ्त सुविधाओं की राजनीति अपने चरम पर है। जिसे प्रकृति ने बिना किसी कीमत के दिया था, वही जब लोगों की जिंदगी से गायब हो जाए, तो लोकलुभावन वादों की कीमत ही क्या रह जाती है?

मगर हकीकत न जनता समझ पा रही है और न ही राजनीतिक दल उसे समझने देना चाहते हैं। उनकी दिलचस्पी बस किसी भी तरह सत्ता में बने रहने तक सीमित है। दिल्ली की फिक्र किसे है? शायद उसे आज भी अपने उस 'ग़ालिब' की तलाश है, जो उसके बारे में सोचे, उसकी सच्ची तस्वीर देखे और दिखाए।

चुनाव 2025 और मुफ्त योजनाओं की होड़

फरवरी 5, 2025 को दिल्ली के विधानसभा चुनाव होंगे और 8 फरवरी को नतीजे घोषित किए जाएंगे। विभिन्न राजनीतिक दल मुफ़्त सुविधाओं वाले वादों से अपनी चुनावी रणनीतियों को धार देने में जुट गए हैं। हालांकि, लोकलुभावन वादों का सहारा लेना भारतीय राजनीति में कोई नई परिघटना नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति चुनावी राजनीति में अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई है। खासतौर पर आम आदमी पार्टी (आप), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इस प्रवृत्ति को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है।

दिल्ली की चुनावी फिज़ा में मुफ़्त योजनाओं के प्रभाव को अनदेखा करना असंभव हो गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि इन योजनाओं का प्रभाव केवल चुनावी गणित तक सीमित है, या फिर वे राजधानी में लोकतंत्र, शासन और लोक कल्याण की दिशा को भी प्रभावित कर रही हैं?

मुफ़्त योजनाएं: आधुनिक राजनीति का नया अस्त्र

भारतीय राजनीति में लोकलुभावन योजनाओं की परंपरा दशकों पुरानी है, लेकिन दिल्ली में इसका नया स्वरूप देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने बिजली और पानी की मुफ्त आपूर्ति को अपने राजनीतिक ब्रांड का अभिन्न हिस्सा बना लिया है। साल 2015 और 2020 के चुनावों में यह रणनीति बेहद प्रभावी साबित हुई, जहाँ लोगों को सीधे लाभ देने की नीति ने शहरी मतदाताओं के बड़े वर्ग को आकर्षित किया था।

अब जब यह रणनीति कारगर साबित हो चुकी थी, तो अन्य दल भी इस नुस्खे को अपनाने लगे। भाजपा ने वरिष्ठ नागरिकों, छात्रों और निम्न वर्ग के लिए मुफ्त चिकित्सा सुविधा, स्वास्थ्य कार्ड और वित्तीय सहायता जैसे वादों को अपने एजेंडे में शामिल किया है। वहीं, कांग्रेस भी लड़कियों को मुफ्त शिक्षा और गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता देने के वादों के साथ मैदान में उतर गई है। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि दिल्ली की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब सुशासन के मॉडल के बजाय मुफ्त योजनाओं की होड़ में तब्दील हो गई है।

लोकलुभावन वादों का आकर्षण और उनकी वास्तविकता

लोकलुभावन वादों का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वे जनता को तत्काल राहत और लाभ प्रदान करने का वादा करते हैं। विशेष रूप से निम्न और मध्यम वर्ग के लिए ये योजनाएँ किसी वरदान से कम नहीं लगतीं हैं। हालाँकि, जब इन वादों की दीर्घकालिक स्थिरता और प्रभावशीलता की पड़ताल की जाती है, तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं-

  • क्या ये योजनाएँ राज्य के वित्तीय संसाधनों के अनुरूप हैं? दिल्ली में मुफ्त बिजली और पानी की योजनाओं ने लाखों लोगों को राहत दी है, लेकिन सरकारी बजट पर इनका भारी दबाव पड़ता है। कर राजस्व सीमित होता है, और जब एक बड़ा हिस्सा मुफ्त सुविधाओं पर खर्च किया जाता है, तो बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक परिवहन के लिए पर्याप्त खर्च कहां से आएगा?

  • क्या ये योजनाएँ जनता का दीर्घकालीन कल्याण सुनिश्चित करती हैं? अल्पकालिक राहत प्रदान करने वाली नीतियाँ तात्कालिक रूप से लोकप्रिय हो सकती हैं, लेकिन वे अक्सर रोजगार सृजन, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बुनियादी संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता को दरकिनार कर देती हैं। जब पार्टियां मुफ्त योजनाओं पर अधिक ध्यान देती हैं, तो दीर्घकालिक विकास परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति असंतुलित हो सकती है।

  • क्या यह प्रवृत्ति मतदाताओं को दीर्घकालिक सोच से दूर कर रही है? जब चुनावी राजनीति इन वादों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, तो शासन की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। मतदाता भी इन योजनाओं की वास्तविकता से परे जाकर यह नहीं सोचते कि राज्य के आर्थिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग कैसे हो सकता है।

चुनावी राजनीति बनाम शासन की गुणवत्ता

लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक बेहतर शासन व्यवस्था की दिशा भी प्रशस्त करता है। लेकिन देश में जिस तरह मुफ्त योजनाओं का वर्चस्व बढ़ा है, उसने शासन की प्राथमिकताओं को एक नई दिशा में मोड़ दिया है।

अगर सरकारें केवल मुफ्त योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगी, तो दीर्घकालिक नीतिगत सुधारों की गुंजाइश कम हो जाएगी। हिमाचल प्रदेश इसका एक उदाहरण है, जहाँ मुफ्त योजनाओं का अत्यधिक विस्तार राज्य को वित्तीय संकट जैसी स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी।

शासन की गुणवत्ता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि सरकार कितनी मुफ्त सुविधाएँ दे रही है, बल्कि इस पर भी कि वह अपनी वित्तीय स्थिति को संतुलित रखते हुए जनसेवाओं की गुणवत्ता में कैसे सुधार कर रही है।

क्या वोटर्स नहीं जानते हैं कि मुफ़्त का माल हमेशा किसी न किसी कीमत पर आता है, और लोकतंत्र में उस कीमत का भुगतान देश की जनता करती है?

दिल्ली चुनाव 2025: एक बड़ा फैसला

दिल्ली चुनाव 2025 केवल सत्ता परिवर्तन या सरकार गठन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि राजधानी में शासन की प्राथमिकताएँ क्या होंगी - क्या यह लोकलुभावनवाद और मुफ्त योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा, या फिर शासन की गुणवत्ता और नीति निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल होगी?

लोकतांत्रिक शासन केवल चुनाव जीतने की रणनीतियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि दीर्घकालिक नीतियों और प्रभावी प्रशासनिक सुधारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जनता को भी यह समझने की ज़रूरत है कि केवल मुफ्त योजनाओं को देखकर वोट देना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह देखना भी ज़रूरी है कि सरकार किस तरह से आर्थिक संतुलन बनाए रखते हुए अपने संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग कर रही है।

अगर राजनीति केवल मुफ्त योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमेगी, तो चुनावी जीत संभव है, लेकिन लोकतंत्र का मूल दीर्घकालिक जनकल्याण उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाएगा। 

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