विधानसभा सचिवालय में भर्ती घोटाला: हिमाचल में सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार की गूंज

सांकेतिक चित्र : चैट जीपीटी 

सुरिन्द्र कुमार: सरकारी भर्तियों में जब पारदर्शिता को दरकिनार कर सत्ता का हस्तक्षेप हावी हो जाता है, तो इसका असर केवल कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक व्यापक समस्या को जन्म देता है। ऐसे मामलों के बाद युवाओं में भारी असंतोष पनपता है, जो विरोध प्रदर्शनों और न्यायिक कार्रवाई की मांग को मजबूती देता है। विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार को कटघरे में खड़ा करता है, जिससे सदन में तीखी बहसें होती हैं और जांच की मांग तेज हो जाती है। यदि मामला तूल पकड़ता है, तो न्यायपालिका भी स्वतः संज्ञान ले सकती है, जिससे भर्ती रद्द होने या जांच बैठने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। सत्ता पक्ष अक्सर इसे बचाव की मुद्रा में खारिज करने या खानापूर्ति के लिए जांच समिति गठित करने की कोशिश करता है, जो ज्यादातर मामलों में ठंडे बस्ते में चली जाती है। इस तरह की घटनाओं से भविष्य की भर्तियों की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है, जिससे योग्य उम्मीदवारों के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं और पारदर्शिता पर संदेह गहरा जाता है। अगर हिमाचल विधानसभा सचिवालय जैसी संस्थाओं में ही इस तरह की धांधली होगी, तो क्या यह प्रदेश के युवाओं के लिए न्यायसंगत भविष्य सुनिश्चित कर पाएगा, या फिर यह लोकतंत्र के पतन की एक और कड़ी साबित होगा?

हिमाचल प्रदेश विधानसभा सचिवालय में हुई हालिया भर्तियों ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया है। यह मामला सिर्फ सरकारी नौकरियों में पक्षपात का नहीं बल्कि सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण है, जहां योग्यता को दरकिनार कर सत्ता से जुड़े नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से उम्मीदवारों का चयन किया गया। भाजपा विधायक रणधीर शर्मा ने आरोप लगाया है कि विधानसभा सचिवालय ने 31 जनवरी को दो अधिसूचनाएं जारी कर 14 लोगों की नियुक्तियां की, जिनमें से पांच विधानसभा अध्यक्ष के निर्वाचन क्षेत्र चंबा, पांच मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र हमीरपुर और दो-तीन उपाध्यक्ष के निर्वाचन क्षेत्र सिरमौर से की गईं। अगर यह भर्तियां पारदर्शी थीं, तो पूरे हिमाचल से योग्य उम्मीदवारों को मौका क्यों नहीं मिला? क्या सरकारी नौकरी अब सिर्फ सत्ता के करीबी लोगों का विशेषाधिकार बन चुकी है?

सत्ता के साये में धांधली

इस पूरे मामले में सरकार का रवैया चौंकाने वाला है। मुख्यमंत्री ने अपने चुनावी वादों में 5 लाख सरकारी नौकरियों की गारंटी दी थी, लेकिन जब अवसर आया तो नौकरियां केवल अपने प्रभावशाली साथियों और उनके क्षेत्रों के लोगों को बांट दी गईं। यह बेरोजगार युवाओं के साथ सबसे बड़ा छलावा है। राज्य में हजारों योग्य अभ्यर्थी वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन जब नौकरियां आती हैं, तो उन्हें केवल सत्ता के खास लोगों के बीच बांट दिया जाता है। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता का कोई स्थान नहीं बचा है, और यह साफ संकेत देता है कि अगर आप सत्ता के करीबी नहीं हैं, तो आपकी मेहनत का कोई मोल नहीं है।

अगर इन नियुक्तियों में पारदर्शिता थी, तो सरकार को बताना चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया को गुप्त क्यों रखा गया? क्यों मेरिट लिस्ट सार्वजनिक नहीं की गई? आखिर किस आधार पर केवल कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों के लोगों को चुना गया? विधानसभा सचिवालय के प्रवक्ता ने सफाई दी कि नियुक्तियां "पारदर्शी तरीके" से की गई हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर यह पारदर्शी थीं, तो पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? जब कोई सरकार अपने ही जनता के सामने जवाबदेही से बचने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसमें पारदर्शिता खत्म हो चुकी है। यह जवाब नहीं बल्कि लीपापोती है, और जनता इसे स्वीकार नहीं कर सकती।

हिमाचल प्रदेश पहले ही बेरोजगारी के संकट से जूझ रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सरकारी नौकरियों में इस तरह की धांधली युवाओं के भविष्य पर सीधा हमला है। अगर यही रवैया जारी रहा, तो हिमाचल के युवा सरकारी नौकरियों से पूरी तरह से भरोसा खो देंगे और या तो पलायन करेंगे या फिर गलत रास्तों पर जाने को मजबूर होंगे। हिमाचल सरकार को यह समझना होगा कि सरकारी नौकरियां किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं हैं, जिसे वे अपने करीबी लोगों में बांट सकें। यह जनता के करदाताओं के पैसे से दी जाने वाली नौकरियां हैं, और इनमें योग्यता से समझौता नहीं किया जा सकता।

इस पूरे घटनाक्रम ने हिमाचल प्रदेश में सत्ता और नौकरशाही के बीच गहरे सांठगांठ को उजागर कर दिया है। यह केवल 14 नौकरियों का मामला नहीं है, बल्कि यह उस बड़े तंत्र का हिस्सा है, जहां सरकारी भर्तियों को एक राजनीतिक औजार बना दिया गया है। अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह प्रवृत्ति अन्य सरकारी विभागों तक भी फैल जाएगी और सरकारी नौकरियां एक ‘बंद क्लब’ में तब्दील हो जाएंगी, जहां केवल सत्ता के करीबी लोगों को ही प्रवेश मिलेगा।

सत्ता बदल रही, लेकिन भ्रष्टाचार बरकरार

जनता को अब यह तय करना होगा कि क्या वह इस तरह की धांधलियों को सहन करती रहेगी, या इसके खिलाफ आवाज उठाएगी। यह मामला न्यायपालिका और मीडिया के लिए भी एक परीक्षा है कि क्या वे इस भ्रष्टाचार को उजागर कर सही कार्रवाई के लिए सरकार पर दबाव बना सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में पहले भी सरकारी भर्तियों में अनियमितताओं के कई मामले सामने आ चुके हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (HPSSC) को पेपर लीक मामलों के कारण भंग करना पड़ा था। इससे साफ होता है कि प्रदेश की भर्ती प्रणाली पहले से ही भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी हुई है, और अब विधानसभा सचिवालय में इस तरह की नियुक्तियां यह साबित कर रही हैं कि सत्ता में बैठे लोगों ने इस भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दे दिया है।

मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे इस भर्ती प्रक्रिया को न्यायसंगत मानते हैं या नहीं। अगर वे इसे सही मानते हैं, तो फिर सरकार को यह घोषित कर देना चाहिए कि सरकारी नौकरियां अब मेरिट के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक संपर्कों के आधार पर मिलेंगी। अगर वे इसे गलत मानते हैं, तो इसकी स्वतंत्र जांच क्यों नहीं करवा रहे? क्या मुख्यमंत्री अपने ही प्रभावशाली साथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से डर रहे हैं?

इस पूरे मामले में जनता को सतर्क रहना होगा। जब तक जनता इस तरह की धांधलियों पर चुप्पी साधे रहेगी, तब तक सत्ता पक्ष की हिम्मत और बढ़ती जाएगी। यह मामला केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहां सरकारी नौकरियों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अगर हिमाचल के युवा और जनता आज इस मुद्दे पर खड़े नहीं हुए, तो आने वाले समय में सरकारी नौकरियों का पूरा तंत्र ही एक ‘पारिवारिक और राजनीतिक कनेक्शन’ का खेल बनकर रह जाएगा।

सरकार को चाहिए कि वह इस भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच करवाए और यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो सभी नियुक्तियों को रद्द कर पुनः पारदर्शी प्रक्रिया के तहत भर्ती की जाए। साथ ही, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में सरकारी भर्तियों की प्रक्रिया पूरी तरह सार्वजनिक और पारदर्शी हो, ताकि कोई भी व्यक्ति योग्यता के आधार पर नौकरियों से वंचित न रहे।

यदि इस भ्रष्टाचार पर तुरंत कार्रवाई नहीं हुई, तो यह हिमाचल प्रदेश में सरकारी नौकरियों के प्रति जनता के विश्वास को पूरी तरह से खत्म कर देगा। यह मामला केवल 14 नौकरियों का नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश में सरकारी भर्तियों की निष्पक्षता और पारदर्शिता का भी है। जनता को चाहिए कि वह सरकार से इस मुद्दे पर जवाब मांगे और मांग करे कि हर सरकारी भर्ती की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो, ताकि हिमाचल का हर योग्य युवा अपनी मेहनत का सही फल पा सके। अगर इस पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संकेत होगा कि हिमाचल प्रदेश की सरकार खुद इस भ्रष्टाचार में संलिप्त है और प्रदेश के बेरोजगार युवाओं का भविष्य उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।

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